“लालू ने खेला अखिलेश वाला दांव, फिर भी कांग्रेस पर आरजेडी क्यों नहीं ला सकी दबाव?”
बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन महागठबंधन (इंडिया ब्लॉक) में सीट शेयरिंग का फॉर्मूला अभी तक तय नहीं हो सका है। इस असमंजस के बीच लालू प्रसाद यादव ने अपने सियासी दांव चलना शुरू कर दिया है। उन्होंने आरजेडी के नेताओं को पार्टी का सिंबल देकर चुनावी मोर्चे को मजबूत करने का संकेत दे दिया है। यह कदम गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर चल रहे गतिरोध को दर्शाता है और लालू यादव की सियासी रणनीति का हिस्सा है, जो उनकी राजनीतिक चालाकी और दबाव बनाने की क्षमता को दर्शाता है।
महागठबंधन में असमंजस का कारण
बिहार में विधानसभा चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं। नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन गठबंधन की प्रमुख पार्टियों—आरजेडी, कांग्रेस, वीआईपी और वाम दलों—के बीच सीट शेयरिंग को लेकर मतभेद और असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, सभी पार्टियों का मानना है कि सीट बंटवारे का फॉर्मूला जल्दी से तय होना चाहिए ताकि प्रत्याशियों के नामों पर अंतिम फैसला लिया जा सके। लेकिन, मुद्दा यह है कि हर पार्टी अपनी-अपनी सीटों पर पकड़ मजबूत बनाना चाहती है, और इस वजह से फॉर्मूला फाइनल करने में देरी हो रही है।
लालू यादव का सियासी दांव
इसी बीच, लालू प्रसाद यादव ने अपनी रणनीति के तहत पार्टी के उम्मीदवारों को सिंबल बांटना शुरू कर दिया है। उन्होंने सोमवार देर शाम करीब आधा दर्जन सीटों पर अपने उम्मीदवारों को पार्टी का सिंबल सौंपा। इनमें मनेर विधानसभा सीट से मौजूदा विधायक भाई वीरेंद्र, मसौढ़ी (सुरक्षित) सीट से रेखा पासवान, मटिहानी से बोगो सिंह, परबत्ता से डॉ. संजीव कुमार, हथुआ से राजेश कुमार और संदेश से दीपू सिंह को टिकट जारी किया गया।
यह कदम लालू यादव की ओर से प्रेशर पॉलिटिक्स का एक दांव माना जा रहा है, ताकि गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर हो रही देरी को तोड़ा जा सके। लालू यादव का मानना है कि यदि वे अपने उम्मीदवारों को सिंबल देकर चुनाव लड़ने का संकेत दे देते हैं, तो यह गठबंधन की गंभीरता और सीट बंटवारे की आवश्यकता पर सवाल खड़ा कर सकता है। इस तरह, लालू यादव ने महागठबंधन में अपनी स्थिति मजबूत करने और कांग्रेस पर दबाव बनाने का प्रयास किया है।
सीन बदलना: तेजस्वी का पटना पहुंचना
हालांकि, लालू यादव का यह कदम तेजस्वी यादव के पटना पहुंचने के बाद ही उलटफेर का शिकार हो गया। तेजस्वी यादव के पहुंचते ही स्थिति बदल गई। लालू ने जो सीटें निर्दिष्ट की थीं, उनमें से कुछ पर पार्टी के और उम्मीदवारों को टिकट देने का फैसला किया गया है। इससे संकेत मिलता है कि लालू यादव का सियासी दांव अभी भी बिखरा हुआ है और गठबंधन की तस्वीर अभी भी साफ नहीं है। तेजस्वी यादव की उपस्थिति से यह भी जाहिर हो गया कि पार्टी अभी भी सीट शेयरिंग को लेकर गंभीर है और वह अपने राष्ट्रीय नेताओं के साथ बैठक कर अंतिम फैसला लेगी।
2024 का सियासी खेल: अखिलेश यादव का तर्ज
यह स्थिति बिहार के सियासी परिदृश्य के साथ-साथ 2024 के यूपी विधानसभा और लोकसभा चुनावों की भी झलक पेश करती है। साल 2024 में, सपा और कांग्रेस ने मिलकर यूपी में लोकसभा चुनाव लड़ा था। उस समय, सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों के बीच शह-मात का खेल चल रहा था, और इस कारण कई सीटों पर विवाद हुआ। अखिलेश यादव ने तब बिना इंतजार किए अपने उम्मीदवारों को टिकट बांटने का कदम उठाया, जिससे कांग्रेस बैकफुट पर आ गई और अंततः दोनों दलों ने अपने-अपने फॉर्मूले पर समझौता किया।
अब, लालू यादव ने बिहार में उसी रणनीति का सहारा लिया है। उनके अनुसार, यदि गठबंधन में सीट बंटवारे का फॉर्मूला तय करने में देरी हुई, तो वे अपने उम्मीदवारों को सिंबल देकर चुनाव लड़ने का विकल्प अपना सकते हैं। इससे कांग्रेस पर दबाव बढ़ेगा और गठबंधन की मजबूती पर सवाल खड़ा हो सकता है। लालू यादव का यह कदम इस बात का संकेत है कि वे अपने सियासी हितों को प्राथमिकता दे रहे हैं, और यदि गठबंधन का रास्ता नहीं निकला, तो वे अपने दम पर मैदान में उतरने का मन बना चुके हैं।
राजनीतिक प्रभाव और भविष्य का संकेत
बिहार में महागठबंधन के इस सियासी खेल का सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ेगा। यदि सीट बंटवारे का फॉर्मूला तय नहीं होता है, तो यह मतभेद वोटों के विभाजन का कारण बन सकता है, जो कहीं न कहीं महागठबंधन की हार का संकेत हो सकता है। वहीं, लालू यादव का अपनी पार्टी का सिंबल देकर उम्मीदवार खड़ा करना भाजपा और अन्य विपक्षी दलों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है, क्योंकि इससे वे अपने समर्थकों को सीधे चुनाव लड़ने का विकल्प दे सकते हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव के इस जटिल समीकरण में लालू यादव ने अपनी सियासी चालाकी का प्रदर्शन किया है। महागठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर जारी गतिरोध के बीच, लालू यादव का सिंबल वितरण का कदम पार्टी की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। यह जरूरी है कि सभी दल जल्द से जल्द अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट करें और चुनावी मैदान में उतरने से पहले सीट बंटवारे का फॉर्मूला तय करें। तभी नतीजे साफ होंगे और बिहार के मतदाता चुनाव के असली मुद्दों पर वोट कर सकेंगे।यह सियासी खेल अभी जारी है, और आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।



