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बिहार विधानसभा चुनाव 2025: इन खानदानी सीटों पर सियासी परिवारों का है वर्चस्व, जानिए पूरी जानकारी

 बिहार विधानसभा चुनाव 2025: इन खानदानी सीटों पर सियासी परिवारों का है वर्चस्व, जानिए पूरी जानकारी
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बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव बहुत ही खास होने वाला है। चुनाव आयोग ने तय किया है कि वह शाम 4 बजे चुनाव की तारीखों का ऐलान करेगा। जैसे ही तारीखों का जिक्र होगा, वैसे ही राजनीति में हलचल शुरू हो जाएगी। इस बार के चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात है सीटों का बंटवारा। बिहार में सीटों को लेकर महागठबंधन और NDA दोनों ही फंसे हुए हैं। दोनों पक्ष अभी भी सीटों के मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं।

बिहार में बीजेपी का मानना है कि इस बार वह बहुत मजबूत स्थिति में है। बीजेपी ने उन सीटों पर चर्चा की है जहां वह लगातार जीत रही है। यानी जिन सीटों पर पिछले 5 या 6 चुनावों से बीजेपी जीतती आ रही है, उन्हें पार्टी अपनी “पक्की सीटें” मानती है। ऐसी सीटें बिहार के कई हिस्सों में हैं। इनमें से कुछ हैं रामनगर, चनपटिया, रक्सौल, बनमनखी, पूर्णिया, हाजीपुर, कुम्हरार, पटना साहिब और गया टाउन। इन नौ सीटों पर बीजेपी लगातार 6 बार से जीत रही है।

अब बात करते हैं उन सीटों की जहां वर्चस्व का बोलबाला है। बिहार में सीटों का दो तरह से वर्गीकरण किया गया है। पहली श्रेणी उन सीटों की है जहां का जातीय समीकरण किसी पार्टी के लिए अनुकूल है। मतलब वहां का मतदाता खास जाति या समुदाय का समर्थन करता है। दूसरी श्रेणी उन सीटों की है जहां परिवारों का प्रभाव ज्यादा है। यानी एक ही परिवार या खानदान का दबदबा रहता है। इन सीटों पर अक्सर वही परिवार जीतते हैं और उनका राजनीतिक प्रभाव भी ज्यादा होता है।

बिहार के राजनीतिक विश्लेषक प्रशांत किशोर का कहना है कि बिहार में करीब 1200 राजनीतिक परिवार हैं। ये परिवार ही नेता तैयार करते हैं। राजनीतिक पार्टियों के टिकट भी इन परिवारों को ही मिलते हैं। विधायक और मंत्री भी अक्सर इन्हीं परिवारों से बनते हैं। प्रशांत किशोर ने इन 1200 परिवारों की एक लिस्ट बनाई है। लेकिन इनमें से अधिकांश दबदबे वाले परिवार केवल 50 से ज्यादा नहीं हैं। यानी, बिहार की राजनीति में बहुत ही कम परिवार बहुत बड़ा प्रभाव रखते हैं।

बिहार में कई सीटें ऐसी हैं जहां एक ही परिवार का प्रभाव ज़्यादा है। इन्हें खानदानी सीटें कहा जाता है। इन सीटों पर अक्सर वही परिवार चुनाव जीतते हैं। यह स्थिति ऐसी हो गई है कि कई बार चुनाव जीतने के लिए परिवार का नाम ही काफी हो जाता है। बिहार में राजनीतिक परिवारों का यह प्रभाव बहुत पुराना है। कई परिवार दशकों से चुनाव जीतते आ रहे हैं।

यह सब दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में परिवारों का बहुत बड़ा दबदबा है। इन परिवारों का प्रभाव चुनाव के नतीजे पर भी बहुत असर डालता है। वहीं, जातीय समीकरण भी चुनाव की रणनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। बिहार में चुनाव लड़ने और जीतने के लिए केवल जनता का समर्थन ही नहीं, बल्कि परिवारों का भी खासा प्रभाव रहता है।

अंत में, कहा जा सकता है कि बिहार की राजनीति में बदलाव की उम्मीद तो है, लेकिन अभी भी परिवारों और जातीय समीकरण का प्रभाव बहुत ज्यादा है। जैसे ही चुनाव की तारीखों का ऐलान होगा, राजनीति में नई हलचल देखने को मिलेगी। देखना यह है कि इस बार कौन-कौन सी पार्टी और नेता बिहार की जनता का भरोसा जीतने में कामयाब होते हैं। बिहार की राजनीति का यह खेल अभी भी जारी है, और आने वाले दिनों में इसका परिणाम देखने को मिलेगा।

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